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VOL. 3, ISSUE 4 (2018)
आदिवासी लोक साहित्य का समान्य लोक कथाओं में सामाजिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ का अध्ययन
Authors
डाॅ0 सुनीता सिंह मरकाम
Abstract
आदिवासी लोकसाहित्य समाज का एक ऐसा दर्पण है जिसमें आदिम संस्कृति रीति-रिवाज एवं संस्कार के प्रतिबिम्ब दिखाई देते है। लोक साहित्य ऐसा मिश्रित साहित्य है जिसका सृजन विभिन्न सामाजिक संस्कृतियों के समागम से हुआ है आज के युग में भी जो सादगी सदाचार एवं निर्मलता यहाँ के लोक साहित्य में उपलब्ध है वह अन्यत्र शिष्ट साहित्य में दुलर्भ है यहाँ जि समाज का चित्रण हुआ है वह स्वस्थ्य सदाचारी भोली एवं धर्म भीरू है। जनजातीय लोक साहित्य में जो अभिव्यक्ति उनके जीवन और जीवन प्रक्रिया गरीबी-भूख और विवशता से जुड़ी हुई है, वह भी सभ्य एवं शिष्ट कहे जाने वाले समाज के लिए उनकी ओर मुखातिब होंने और जनजातीय समाज के प्रति संवेदनात्मक भाव अपने के लिए प्रेरित और आकर्षित करती है। जनजातीय लोकगीतों में जो स्वाभाविक निश्छलता निराभिमानता और प्रकृति से जूझने तथा साहसपूर्ण जीवन जीने की उत्कट अभिलाषाएँ एवं उत्साह दिखाई पड़ते हैं वह भी अन्य भारतीय समाजों के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन के उत्तम उदाहरण है। साहित्य का लिखित रूप न होंने के बावजूद भी ये अपनी सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को कंठ और नृत्य के माध्यम से साथ ही गाथा रंगमंच और रंगकर्म के माध्यम से संजोये हुए है यह अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।
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Pages:74-76
How to cite this article:
डाॅ0 सुनीता सिंह मरकाम "आदिवासी लोक साहित्य का समान्य लोक कथाओं में सामाजिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ का अध्ययन". International Journal of Advanced Research and Development, Vol 3, Issue 4, 2018, Pages 74-76
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