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VOL. 3, ISSUE 1 (2018)
रजतोपदेशमहाकाव्य में प्रतिपादित माता-गुरु-ईष-शास्त्रश्रद्धा : एक विमर्श
Authors
दीनदयाल सैनी, डाॅ. सूर्यनारायण गौतम
Abstract
साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं जो उसके स्वरूप का बोध कराये। वह मार्गदर्शक भी है जो उसके कत्र्तव्य का बोध भी कराता है। आज समाज में उन नैतिकमूल्यों का ह्रास हो रहा है जिससे समाज में नित नई कुरीतियां फैल रही हैं। आज समाज का प्रत्येक युवक प्रायः नास्तिक सा होता दिखाई दे रहा है। यदि आस्तिकता कुछ झलकती भी है तो वह भी केवल स्वार्थ के वशीभूत होकर ही। संसार के सारे रिश्ते-नाते केवल स्वार्थ पर टिके से दिख रहे हैं। ऐसे में रजत मुनि के जीवन चरित्र पर आधारित महाकवि शम्भुदयाल पाण्डेय द्वारा विरचित रजतोपदेश महाकाव्य भारतवर्ष के उन समस्त भटके हुए युवाओं को कत्र्तव्यबोध करायेगा जिससे एक नवीन एवं स्वस्थ समाज का निर्माण हो सकेगा। प्रस्तुत शोध आलेख में कुछ ऐसी ही विचारधाराओं का चिन्तन किया गया है।
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Pages:953-954
How to cite this article:
दीनदयाल सैनी, डाॅ. सूर्यनारायण गौतम "रजतोपदेशमहाकाव्य में प्रतिपादित माता-गुरु-ईष-शास्त्रश्रद्धा : एक विमर्श". International Journal of Advanced Research and Development, Vol 3, Issue 1, 2018, Pages 953-954
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