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VOL. 4, ISSUE 6 (2019)
रामकथा की रचनाओं में अभिव्यक्त जीवन दर्शन का अनुशीलन अध्ययन
Authors
डाॅ. अंशुला मिश्रा
Abstract
यह धार्मिक आन्दोलन 14 वीं शताब्दी के प्रारंभ में रामानुजाचार्य के विशिष्टा-द्वैतवादी ’श्री सम्प्रदाय’ को स्वामी रामानन्द जी ने अत्यन्त व्यापक और जन-प्रचलित बना दिया, परिणामस्वरूप सगुण भक्ति का द्वार सभी जातियों के लिए खुल गया। उन्होंने ’रामानन्दी’ सम्प्रदाय की स्थापना की, जो श्री सम्प्रदाय के ही समान थी। कुछ व्यावहारिक भिन्नता अवश्य थी किन्तु भेद नहीं था। दोनों का एक ही सिद्धान्त था, ’हरि-हर को भजै सो हरि-हर का कोई।’ तुलसी ने इसी सिद्धान्त को अत्यन्त व्यावहारिक बना दिया। निषादराज वशिष्ठ का मिलन इसी का परिचायक है। ’मानस’ में राम स्वयं अपने श्री मुख से कहते हैं - ’मानउँ एक भगति कर नाता।’
स्वामी रामानन्द द्वारा राम भक्ति का प्रचार हुआ और निम्बार्काचार्य, माधवाचार्य, विष्णुस्वामी, आनन्दतीर्थ, चैतन्य महाप्रभु, वल्लभाचार्य तथा उनके पुत्र विट्ठलनाथ और हितहरिवंश द्वारा कृष्ण भक्ति का प्रसार व प्रचार हुआ हुआ। कुछ ने मधुर भाव को ग्रहण किया, किसी ने प्रेम लक्षण भक्ति को प्रश्रय दिया। विट्ठलनाथ ने अष्टछाप की स्थापना की। इस प्रकार सम्पूर्ण भारत भक्ति की विभिन्न धाराओं की ओर उन्मुख हो गया। किन्तु यही विभिन्न धाराएं आगे चलकर सोलहवीं शताब्दी के पूर्व भारत के उत्तरी क्षेत्र में वाद का रूप धारण कर लेती है। व्यक्तिगत अंहकार ने धर्म का स्थान ले लिया था, इसलिए उसमें दिखावा आ गया था, भक्ति-धर्म का स्वरूप अवैष्णवीय अधिक हो गया था। तुलसी ने धर्म की इसी दशा का वर्णन ’रामचरित मानस’, ’विनयपत्रिका’ में किया है। इन वर्णनों से संकेत मिलता है कि उस समय भिन्न-भिन्न पंथ और भिन्न-भिन्न मत फैले हुए थे, जो सार्वजनिक नहीं, व्यक्तिवाद के परिचायक थे।
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Pages:07-09
How to cite this article:
डाॅ. अंशुला मिश्रा "रामकथा की रचनाओं में अभिव्यक्त जीवन दर्शन का अनुशीलन अध्ययन". International Journal of Advanced Research and Development, Vol 4, Issue 6, 2019, Pages 07-09
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