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VOL. 3, ISSUE 4 (2018)
बघेलखण्ड की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का समीक्षात्मक अध्ययन
Authors
डाॅ0 नृपेन्द्र सिंह परिहार
Abstract
बघेलयुगीन विन्ध्य क्षेत्र इसकी सबसे बड़ी रियासत रही है, रीवा और संयुक्त रही हैं, कोठी, सोहाबल, नागौद, मैहर, बरौंधा के साथ ही जागीरें जसो, रयगाँव व अन्य चाद छोटी जागीरें। यही क्षेत्र तत्कालीन पोलेटिकल एजेन्ट के आदेश (सन 1871) से बघेलखण्ड कहा और लिखा जाने लगा। इस क्षेत्र में बघेल युग की शुरुआत हुई ईस्वी सन् 1562 में जब बघेल राज्य गहोरा नरेश, रामचन्द्र जू देव (1555 गहोरा 1562 बाँधौगढ़ 1592ई.) ने विन्ध्य क्षेत्र आकर बाँधौगढ़ में बाँधौराज्य की आधारशिला धरी। बघेल राज्य गहोरा यमुना नदी के दक्षिण, पश्चिम से पूरव की ओर पट्टी की भाँति वर्तमान बाँदा क्षेत्र से मिरजापुर क्षेत्र तक स्थिति था। राजा रामचन्द्र के बाद, उनके वारिस राजा वीरभद्र देव (1592-93 ई.) की मृत्यु हुयी, तब उपजे राजनीतिक प्रपंच से तस्त्र इनके पुत्र, राजा विक्रमादित्य (1605-1624) बाँधौगढ़ छोड़ आ पहुंचे रीमाँ। बाँधौगढ़ सन 1597-1602 तक मुगल सल्तनत के अधीन रहा। राजा विक्रमादित्य ने रीमाँ में बिछिया और बीहर नदियों के संगम तट पर, शेरशाह सूरी के पुत्र, जलाल खाँकी ईस्वी सन् 1554 में तामीर कराई रिक्त गढ़ी से जोड़कर अपना आवास निर्मित कराकर किले का आकार दिया। रीमाँ नाम के बघेल राज्य की राजधानी स्थापित हुई। प्रायः तीन सदियों के अंतराल में चलता रीमाँ नाम, अंततः बदल कर रीवा हो गया।
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Pages:67-71
How to cite this article:
डाॅ0 नृपेन्द्र सिंह परिहार "बघेलखण्ड की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का समीक्षात्मक अध्ययन". International Journal of Advanced Research and Development, Vol 3, Issue 4, 2018, Pages 67-71
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