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VOL. 3, ISSUE 3 (2018)
पेसा के प्रभावी क्रियान्वयन एवं उसमें आने वाली चुनौतियां
Authors
विरेन्द्र सिंह ठाकुर
Abstract
लोकतंत्र किसी भी राजनीतिक व्यवस्था का सबसे मजबूत साधन है जिसके माध्यम से हम अपना प्रतिनिधि चयन कर सकते हैं इस प्रणाली को क्रियान्वित करने के लिए हमारे पास पंचायत राज व्यवस्था है जो स्थानीय सरकार की सबसे पूरानी व्यवस्था है। यह महात्मा गांधी के सपने से उभर आया, जो भारत की राजनीतिक व्यवस्था को विकेन्दीकृत करना चाहते थे।
जमीनी स्तर पर शक्तियों का विकेन्द्रीकरण और लोकतंत्र को मजबूत करने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्र में विस्तार) अधिनियम 1996 जिसे अंगे्रजी में पेसा (Panchayat Extention of Sheduled Area) अधिनियम 1996 कहा जाता है 24 दिसंबर 1996 को लाया गया। इसमें जनसाधारण की समस्याओं से निपटने के लिए पेसा अधिनियम एक व्यवहारिक समाधान है। यह जनजातिय क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों, कार्यात्मक गतिविधीयों, रुढ़ियों तथा सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक को जमीनी स्तर मान्यता पर फैसले लेने और विकास प्रक्रिया में अनुसूचित जन जातियों के लिए व्यापक अवसर प्रदान करता है और उनके क्षेत्रों और संसाधनों के अतिक्रमण एवं आजीविका के उनके पारंपरिक संसाधनों से उनके आभाव के कारण इन वर्गो में प्रचलित उदासीनता या अलगाव की भावना को समाप्त करता है इसलिए जनसाधारण की समस्याओं से निपटने के लिए पेसा अधिनियम एक व्यवहारिक समाधान है।
चूंकि पेसा अधिनियम लगभग ढाई दशक से अधिक समय तक संचालन में है और सरकार द्वारा दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिश पर 12 वीं योजना के तहत पेसा क्षेत्रों के लिए विशेष धन एवं अनुदान निर्धारित किया गया है इसलिए यह उचित हो जाता है कि अनुसूचित जन जातियों पर स्वशासन और सशक्तिकरण के मामले मे इसके प्रभार का मूल्यांकन हुआ है कि नहीं ।
पेसा अधिनियम लागू करने के लिए इसे अधिक व्यावहारिक बनाने के लिए कुछ उपचारात्मक कदमों पर प्रकाश डाला गया है। जैसे पंरपरागत कानूनों सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं और सामुदायिक संसाघनों की परंपरागत प्रबन्धन तकनीको को आदीवासी जीवन में केन्द्रीय भूमिका की पहचान करना और उन्हें अनुसूचित क्षेत्रों में स्वषासन की बुनियादी सिद्धान्त बनाना। उसके क्रियाकलापों को परंपरा तथा रिति रिवाजों के मुताबित प्रबन्धन करता है। ग्राम सभा को असाधारण शक्तियों को सौंपकर सषक्त बनाना जोकि आदिवासीयों के जीवन के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इनमें शामिल है- माद्रक द्रव्य के सेवन व ब्रिकी पर प्रतिबनध, लघु बनोपज का मालिकाना हक, अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि हस्तांतरण पर रोक, सामाजिक क्षेत्रों में संस्थाओं और पदाधिकारियों पर नियंत्रण, साहूकारी पर नियंत्रण, और संसाधनों पर नियंत्रण।
परंपरागत आदिवासी आत्म नियम के अनुरूप बनाया गया है जो कि पंचायत राज संस्थानों के राष्ट्रीय ढांचे में नहीं रखा गया है। पंचायती राज मंत्रालय द्वारा कुछ अध्ययनों को चालू कर दिया है और राज्य सरकार को कुछ विषय कानूनों में संसोधन के लिए अनुशंसाएं दी है जो अधिनियम के साथ संघर्ष में है। माॅडल नियम बनाने के लिए परिपत्र और माॅडल नियम को व्यवस्थित करने के लिए दिशा निर्देश आदि जारी किये गये हैं।
इस सबसे शक्तिशाली अधिनियम के अधिनियमन को लगभग दो दशक बीत चुके हैं उसके उपरांत भी संबंधित अधिकांश राज्य सरकारें इस केन्द्रिय अधिनियम को लागू रकने में बहुंत कम प्रगति की है यह परिपत्र पेसा पर ध्यान केंन्द्रित करने की कोशिश करता है।
अनुसूचित जनजातियों के कल्याण एवं उत्थान के लिए पहली बार 73 वें एवं 74 वें संविधान संशोधन द्वारा स्वीकार किया गया। उस समय क्षेत्र में अलग कानून की आवश्यकता होती है और इसे अनुसूचित क्षेत्र में अधिनियमित नहीं किया गया था । उसके बाद सांसद भूरिया की अनुशंसा पर पेसा अधिनियम 1996 भारत में पारित किया गया था इस अधिनियम ने अनुसूचित जनजाति को बहुत से लाभ प्रदान करना शुरू कर दिया। जैसे समुदाय प्राकृतिक संसााधनों पर अधिकार, उनकी संस्कृति और रीति-रिवाजों के संरक्षण और लाभार्थियों का चयन करने का अधिकार, विभिन्न सरकारी योजनाओं के लिए जो उचित तरीके से उपयोग किया जाता है, अनुसूचित जाति के सदस्यों के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व तथा आरक्षण को आवष्यक बनाना। उन्हें सामाजिक सुरक्षा, आवासीय सुविधाओं, अनुसूचित जनजाति के लिये व्यावसायिक अवसर आदि।
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Pages:127-131
How to cite this article:
विरेन्द्र सिंह ठाकुर "पेसा के प्रभावी क्रियान्वयन एवं उसमें आने वाली चुनौतियां". International Journal of Advanced Research and Development, Vol 3, Issue 3, 2018, Pages 127-131
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