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International Journal of
Advanced Research and Development

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VOL. 3, ISSUE 2 (2018)
श्रम एवं श्रमिक : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
Authors
डाॅ0 राजेश कुमार
Abstract
प्राचीन भारतीय समाज में श्रमिकों का महत्वपूर्ण स्थान था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र से लेकर सम्राट अशोक द्वारा बनवाये गये शिलालेखों में यह जानकारी मिलती है। प्राचीन समाज में श्रमिकों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाता था एवं उन्हें मजदूरी दर अच्छी तथा नियमित रूप से मिलती थी। शासन मजदूरों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता था। शासक का कर्तव्य श्रमिकों के लिए समुचित आवास प्रदान करना भी था। शासक मजदूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाऐं भी करता था औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप मजदूर श्रमिकों को अपनी जीविका चलाने का साधन उपलब्ध हुआ। भारत में 1853 में तीन छोटी रेलों की शुरूआत और धीरे-धीरे 1900 तक अधिकांश रेल प्रणाली के पूरे हो जाने और रेल प्रणाली के पूरक के रूप में सड़कों के सुधार व नये सड़क निर्माण ने गांव की पृथकता को तोड़ना आरंभ कर दिया इसका प्रभाव न केवल शहरों की ओर श्रमिकों के जाने पर व्यापार की मात्रा के बढ़ने पर स्पष्ट दिखाई देता है तथा बड़े पैमाने पर कारखाना उत्पादन के विकास का रास्ता खुल गया। ऐसी सभी कारणों से श्रमिक वर्ग का उदय हुआ। औद्योगिक क्रांति का काल पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के विकास का काल माना जाता है। इस समय उत्पादन के साथ में मशीनों आदि परव्यक्तिगत प्रभुत्व उभरने लगा था अधिक पूंजी अधिक उत्पादन के साधनों पर बढने लगी।
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Pages:1228-1230
How to cite this article:
डाॅ0 राजेश कुमार "श्रम एवं श्रमिक : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य". International Journal of Advanced Research and Development, Vol 3, Issue 2, 2018, Pages 1228-1230
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