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VOL. 3, ISSUE 2 (2018)
वर्तमान साहित्य और समाज निर्माण की भूमिका
Authors
डाॅ. सतीश कुमार, डाॅ. गम्भीर सिंह
Abstract
भारतीय साहित्य संकुचितता का नही, पूरी मानवता का साहित्य है। एक देश का नही, पूरे विश्व का साहित्य है। यह बन्धन का नही, मुक्ति का साहित्य है। घृणा का नही, आत्मीयता का साहित्य है।
साहित्य में ही समाज निर्माण की शक्ति होती है। कोई भी विचार शब्द में बंधकर भी स्थाई होता है। पीढ़ियों तक पंहुचता है। भावी पीढ़ी विगत की श्रेष्ठताओं के प्रकाश में अपना मार्ग बनाती है। यह निरंतरता ही उसे परम्परा का आकार देती है। श्रेष्ठता संस्कृति का अधिष्ठान बनती है। संस्कृति, साहित्य के अभाव में स्मृति के बियाबान में खो जाती है। कभी कभी विनष्ट भी हो जाती है। जिस देश का साहित्य नष्ट हो जाता है, उसकी संस्कृति स्वतः नष्ट हो जाती है।
साहित्य और समाज का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध होता है। एक ओर साहित्य का हित और सहित भाव समाज के लिए कल्याणकारी होता है, वही समाज का पारम्परिक आचरण साहित्य को शास्त्र की गरिमा प्रदान करता है। साहित्य को तात्कालिक सामाजिक संक्रमण प्रभावित तो करते हैं, परन्तु सर्जक जो समय और शास्त्र दोनों का ज्ञाता और दृष्टा होता है, वह हंस के नीर क्षीर विवेक की भांति सांस्कृतिक एवं असांस्कृतिक मंे से सांस्कृतिक को चुनता है और शब्द के बल पर समाज को देता है। वैदिक साहित्य के बाद का सृजित साहित्य इसका प्रमाण है।
उन्नीसवीं एवं बीसवीं शताब्दी तो भारतीय साहित्य की सांस्कृतिक समाज निर्माण की शताब्दी कही जा सकती है। इस शताब्दी ने स्वतन्त्रता के साथ-साथ समाज सुधार को भी संघर्ष का विषय बनाया। इस काल के साहित्य ने समाज जागरण के लिए कभी अपनी पुरातन संस्कृति को निष्ठा के साथ स्मरण किया है, तो कभी तात्कालिक स्थितियों पर चिन्ता भी गहराई के साथ व्यक्त की है।
आठवें दशक के बाद से आज तक के काल का साहित्य, जिसे वर्तमान साहित्य कहना अधिक उचित होगा, फिर से अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़, समाज निर्माण की भूमिका को वरियता के साथ पूरा करने में जुटा है। साहित्य होने के फलितार्थ को चरितार्थ करने में लग गया है।
मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ कविता को, जिनने इतना उछाला, उनके लिए भी शिशु, कमल, भैरव, खोह, टूटी चप्पल और चश्में जैसे प्रतीक आज भी समझ से परे है। उस साहित्य को मरना ही था, जो कृष्ण को लम्पट बताये, राम का चरित्र हनन करे। ‘हाथी घोड़ा पालकी’, चुपास मारो दुलहिन’ जैसी कविताएँ भारत की मनीषा को कब रास आने वाली थी। उपन्यासों का नग्न काम यर्थात जुगुप्सा जगाने लगा था। आश्चर्य उन समीक्षकों पर है, उन पत्रिकाओं पर है, जो ऐसे गर्हित साहित्य को उछालने में शब्दों और बुद्धि का अपव्यय कर रहे थे।
वर्तमान साहित्य मानव को श्रेष्ठ बनाने का संकल्प लेकर चला है। व्यापक मानवीय एवं राष्ट्रीय हित इसमे निहित है। साहित्यकारों में राष्ट्रीय स्तर पर हितावय एवं भयावह में अंतर करने की क्षमता ही नही, दृष्टि की स्पष्टता भी जगी है। सृजन आदर्शधारित हो, उद्देश्य पूर्णता एवं उपयोगिता की ओर मुड़ा है। मनुष्य का खंडशः नहीं, समग्र चिन्तन होने लगा है। असत का विरोध तथा सत की प्रतिष्ठा होने लगी है। शाश्वत मूल्य फिर से स्थान पाने लगे हेै। दुःखान्त की नहीं, सुखान्त की प्रतिष्ठा बढ़ी है। लगने लगा है यह भारतीय साहित्य है। भारतीयता इसमें प्रतिबिम्बित होने लगी है। वर्तमान के ये सभी साहित्यकार धन्यवाद के पात्र है। आवश्यकता यही है, गति त्वरित हो। साथ ही इसे समाज के सामने लाने के, प्रकाशन से लेकर समीक्षा तक के प्रयत्नों में तेजी तथा सार्थकता आये। पत्र पत्रिकाओं का प्रभाव क्षेत्र बढ़े।
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Pages:433-436
How to cite this article:
डाॅ. सतीश कुमार, डाॅ. गम्भीर सिंह "वर्तमान साहित्य और समाज निर्माण की भूमिका". International Journal of Advanced Research and Development, Vol 3, Issue 2, 2018, Pages 433-436
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