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VOL. 3, ISSUE 1 (2018)
पश्चात्य दर्शन में सामान्य के अवधारणावादी सिद्धान्त का संक्षिप्त विश्लेषण
Authors
Amit Kumar Singh
Abstract
सामान्य का अवधारणावादी सिद्धान्त यह मानता है कि सामान्य मात्र नाम नहीं हैं उनका अस्तित्व अवधारणाओं के रूप में मन में है, मन से स्वतन्त्र और बाहर नहीं। ये अवधारणाएँ वस्तुओं से सम्बन्धित सामान्य प्रत्यय हैं और इन्हें ही हम सामान्य कहते हैं, जैसे- नीली वस्तुओं से सम्बन्धित ‘नीलापन‘ का सामान्य हमारे मन में है जो सभी नीली वस्तुओं पर समान रूप से लागू होता है। इस मत का स्पष्ट उदाहरण प्राचीन ग्रीक विचारक सुकरात के दर्शन मेें मिलता है। आधुनिक दर्शन में अवधारणावाद का प्रमुख समर्थक जान लाॅक है। लाॅक के अनुसार अवधारणाएँ अमूर्त प्रत्यय हैं। लाॅक ने सामान्य को मानसिक अवधारणा माना है, जिसको अमूर्तिकरण की क्रिया द्वारा प्राप्त किया जाता है।
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Pages:672-674
How to cite this article:
Amit Kumar Singh "पश्चात्य दर्शन में सामान्य के अवधारणावादी सिद्धान्त का संक्षिप्त विश्लेषण". International Journal of Advanced Research and Development, Vol 3, Issue 1, 2018, Pages 672-674
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