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Advanced Research and Development

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VOL. 3, ISSUE 1 (2018)
पाश्चात्य दर्शन में सामान्य का नामवादी सिद्धान्त
Authors
Amit Kumar Singh
Abstract
सामान्य से सम्बन्धित सिद्धान्तों में नामवाद ऐसा सिद्धान्त है जो सामान्यों की स्वतन्त्र सत्ता नहीं मानता उनको नाम के रूप में ही स्वीकार करता है। नामवादियों का मानना है कि सत्ता सिर्फ विशेषों की है, समान्यों की नहीं। सामान्य सिर्फ नाम है और कुछ नहीं। नामवाद के समर्थकों में विलियम ओकम, हाॅब्स, बर्कले और ह्यूम का नाम प्रमुख रूप से आता है। ओकम के अनुसार केवल विशिष्ट वस्तुओं का ही अस्तित्व है सामान्यों की सत्ता को वे नकारते हैं। उनके अनुसार तर्कबुद्धि के द्वारा केवल इन्द्रियग्राह्य विषयों का ही ज्ञान प्राप्त हो सकता है। चूँकि सामान्य इन्द्रियग्राह्य नहीं है इसलिए उनकी सत्ता तर्कबुद्धि द्वारा नहीं सिद्ध हो सकती हैं। सामान्य सिर्फ कोरी कल्पना मात्र हैं और कुछ नहीं। थाॅमस हाॅब्स भी नामवादी हैं उनका विश्वास है कि सामान्य वस्तुएँ केवल सामान्य नाम है, कोई सामान्य वस्तु या सामान्य प्रत्यय नहीं हैं। बर्कले ने भी सामान्य के नामवादी सिद्धान्त का ही समर्थन किया है उनके अनुसार तर्क प्रक्रिया के किसी भी सोपान पर ‘सामान्य’ की आवश्यकता नहीं होती है। बर्कले के अनुसार अमूर्त प्रत्यय काल्पनिक हैं। वास्तविक सत् केवल मूर्त प्रत्यय ही हो सकते है। अमूर्त प्रत्यय नाम के अतिरिक्त कुछ नहीं है। सामान्यों का अस्तित्व न तो प्रकृति में है और न ही मन में है। इसका अस्तित्व केवल नाम के रूप में है। पाश्चात्य दर्शन में ह्यूम भी नामवादी हैं। उनके अनुसार भी सामान्य की सत्ता नाम के रूप में है उनकी वास्तविक सत्ता नहीं होती है।
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Pages:394-396
How to cite this article:
Amit Kumar Singh "पाश्चात्य दर्शन में सामान्य का नामवादी सिद्धान्त". International Journal of Advanced Research and Development, Vol 3, Issue 1, 2018, Pages 394-396
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