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VOL. 2, ISSUE 4 (2017)
राष्ट्रीय चम्बल अभ्यारण्य में सरीसृपों की स्थिति एवं संरक्षण
Authors
आर. के. गुर्जवार, आर. जे. राव
Abstract
राष्ट्रीय चम्बल अभ्यारण्य तीन राज्यों में (मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश एवं राजस्थान) में फैला हुआ है जिसमें चम्बल नदी तथा इसके आस-पास के क्षेत्रों में सम्मिलित किया गया है। वर्तमान शोधकार्य राष्ट्रीय चम्बल अभ्यारण्य में सरीसृपों की स्थिति एवं संरक्षण की योजना के बारे में किया गया हैं। भारत में तीन प्रकार की मगर की प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें स्वच्छ जलीय मगरमच्छ (क्रोकोडायलस् पेलुस्ट्रिस ), घड़ियाल (गेवेलियस गेंगेटिकस ) तथा खारा जलीय मगरमच्छ (क्रोकोडायलस् पोरोसस) हैं। जिसमें सर्वेक्षण के दौरान राष्ट्रीय चम्बल अभ्यारण्य में मगरमच्छ की दो प्रजातियाँ स्वच्छ जलीय मगरमच्छ (क्रोकोडायलस् पेलुस्ट्रिस ) तथा घड़ियाल (गेवेलियस गेन्गेटिकस ) हैं। अंतर्राष्ट्रीय प्राकृतिक एवं प्रकृति स्त्रोत संरक्षण संघ (आई.यू.सी.एन.) के अनुसार स्वच्छ जलीय मगरमच्छ को ‘‘अतिसंवेदनशील‘‘ तथा घड़ियाल (गेवेलियस गेन्गेटिकस ) को ’’अति लुप्तप्राय’’ श्रेणी में रखा गया है। मगरमच्छ और घड़ियाल को अंतराष्ट्रीय व्यापार संरक्षण में वन्य जीव और वनस्पति के लुप्तप्राय प्रजाति (साइट्स) की सारणी के अनुसार सेडयूल-1 की श्रेणी में रखा गया है। तथा कछुओं की 7 प्रजातियाँ दर्ज की गई हैं। जिनमें 1 अति लुप्तप्राय, 4 लुप्तप्राय और 2 को अतिसंवेदनशील की श्रेणी में रखा गया है। सर्वेक्षण के दौरान यह सामने आया है कि मगरमच्छ की दो प्रजातियाँ मगर और घड़ियाल अधिक संख्या में मिले हैं तथा यह भी सामने आया है। कि मुरैना जिले में चम्बल नदी के समीपस्थ गाँव के लोगों द्वारा चम्बल नदी के अनेक स्थानों से रेत का अवेध उत्खनन किया जा रहा है। जिसके कारण सरीसृप प्रजातियों जैसे- घड़ियाल, मगर व कछुओं के प्रजनन स्थल व आवास स्थल नष्ट होते जा रहे है। और यदि इस प्रकार की अवेध खनन की गतिविधिओं को पूर्णतः प्रतिबंधित नही किया गया तो निकट भविष्य में प्रजातियाॅ विलुप्त हो सकती है। सरीर्सपो के संरक्षण हेतू शासन द्वारा वन विभाग को नियुक्त किया गया है। परन्तु व्यापक स्तर पर संरक्षण कार्ययोजना का विस्तार किया जाना चाहिये।
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Pages:393-398
How to cite this article:
आर. के. गुर्जवार, आर. जे. राव "राष्ट्रीय चम्बल अभ्यारण्य में सरीसृपों की स्थिति एवं संरक्षण". International Journal of Advanced Research and Development, Vol 2, Issue 4, 2017, Pages 393-398
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